पुनीत माथुर। इस साल की शुरुआत से अब तक सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दिखाई दे रही है इसके पीछे कई ग्लोबल और घरेलू कारण हैं। 

यह समझना ज़रूरी है कि सोना एक ग्लोबल कमोडिटी है, इसलिए इसकी कीमतें केवल भारत सरकार के हाथ में नहीं होतीं। 

सोना महंगा होने की मुख्य वजहें हैं...

दुनिया भर में राजनीतिक तनाव : जब भी दुनिया में युद्ध (जैसे रूस-यूक्रेन या मध्य पूर्व संकट) या अस्थिरता की स्थिति बनती है, तो निवेशक सुरक्षित निवेश के लिए सोने की ओर भागते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार पर इसकी मांग और कीमतें बढ़ जाती हैं।

डॉलर बनाम रुपया : अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अमेरिकी डॉलर में खरीदा जाता है। यदि रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारत के लिए सोना आयात करना महंगा हो जाता है, जिससे घरेलू कीमतें बढ़ जाती हैं।

केंद्रीय बैंकों द्वारा खरीदारी: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सहित दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए भारी मात्रा में सोना खरीद रहे हैं। ऐसे में बाज़ार की कम उपलब्धता के चलते भी कीमतें बढ़ रही हैं।

बॉण्ड और फिक्स्ड डिपोजिस्ट्स पर ब्याज की दरों में कटौती होना : रिजर्व बैंक द्वारा बॉन्ड और FD पर ब्याज दरों में कटौती होने से लोग इनमें निवेश करने के बजाय सोने में निवेश बढ़ा देते हैं जिससे डिमांड बढ़ने से कीमतें बढ़ जाती हैं।

शादियों और त्योहारों में मांग बढ़ना : भारत में शादी-ब्याह और दीपावली जैसे त्योहारों के सीजन में सोने की मांग बहुत बढ़ जाती है, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ता है। 

अब सवाल उठता है कि क्या सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है? तो बता दें कि सरकार सोने की खुदरा कीमत (Retail Price) तय नहीं करती, क्योंकि यह बाजार की मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है। हालांकि, सरकार सोने पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी को घटाकर कीमतों को कम कर सकती है। उदाहरण के लिए, जुलाई 2024 में सरकार ने राहत देने के लिए ड्यूटी को 15% से घटाकर 6% किया था।

साथ ही भौतिक सोने (गहने/सिक्के) की मांग कम करने के लिए सरकार सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (Sovereign Gold Bonds) और गोल्ड ईटीएफ (ETFs) जैसी योजनाएं चलाती है ताकि लोग कागज या डिजिटल रूप में सोना खरीदें और आयात पर निर्भरता कम हो।

RBI भी रुपए की वैल्यू को स्थिर रखने की कोशिश करता है, जिसका सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ता है। 

संक्षेप में, सोने के दाम ग्लोबल बाजार की परिस्थितियों से तय होते हैं और सरकार केवल करों और नीतियों के माध्यम से इसे कुछ हद तक संतुलित करने का प्रयास कर सकती है।

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