बुद्ध होना चाहती हूँ
अनन्त में ओझल
होना चाहती हूँ
क्या हो पाऊंगी मैं
खुद को इस कदर
खो पाऊंगी मैं
क्या स्वीकार लेंगे मुझे
फिर मेरे अपने
जैसे लौट आये थे बुद्ध
मेरे लौट आने का
कोई रास्ता होगा
क्या फिर इसी तरह
सबसे मेरा वास्ता होगा
भंग होने लगा है मोह
चाह गई रिश्तों की खो
सुदूर कंही सुकून चाहती हूँ
मैं बुद्ध होना चाहती हूँ
आसान तो कुछ भी नही
ये भी नही होगा
तानों से फिर भी मुंह
किसी का बन्द नही होगा
लोग अब भी चुप कहाँ है
कल भी नही होंगें
मगर बंधन खोलना चाहती हूँ
मैं बुद्ध होना चाहती हूँ
अनन्त की खोज में
अपनी ही खोज में
निकलना चाहती हूँ
मैं बुद्ध होना चाहती हूँ 


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