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| बांके बिहारी मंदिर के आज पट बंद हैं जो रात्रि 8 बजे खुलेंगे |
पुनीत माथुर। चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के दौरान मंदिरों के पट बंद रखे जाते हैं, ऐसा करने के पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं, आइए जानें उन कारणों को...
सूतक काल (अशुद्धि का समय): ग्रहण से कुछ समय पहले सूतक काल लग जाता है, जिसे शास्त्रों में 'अशुद्ध' समय माना गया है। इस दौरान किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना, भगवान की मूर्ति का स्पर्श और भोग लगाना वर्जित होता है, इसलिए मंदिरों के द्वार बंद कर दिए जाते हैं।
नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव: आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के समय ब्रह्मांड में नकारात्मक ऊर्जा या विकिरण बढ़ जाता है। मंदिरों में स्थापित मूर्तियां 'प्राण-प्रतिष्ठित' होती हैं और वे सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होती हैं, ग्रहण की छाया से इस ऊर्जा के प्रभाव को बचाने के लिए पट बंद किए जाते हैं।
भगवान का 'कष्ट' काल: पौराणिक कथाओं के अनुसार, ग्रहण वह समय है जब राहु और केतु सूर्य या चंद्रमा को 'ग्रस' लेते हैं, जिसे देवताओं पर संकट का समय माना जाता है। इस दौरान भक्तों को दर्शन के बजाय भगवान को 'विश्राम' और एकांत देने की परंपरा है।
शुद्धिकरण की प्रक्रिया: ग्रहण समाप्त होने के बाद मंदिरों को फिर से शुद्ध किया जाता है। मूर्तियों को गंगाजल से स्नान कराया जाता है और पूरे मंदिर परिसर की सफाई व शुद्धिकरण के बाद ही पट दोबारा खोले जाते हैं।
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| आंध्र प्रदेश का श्री कालहस्ती मंदिर जहां पट खुले हैं |
लेकिन आंध्र प्रदेश का श्री कालहस्ती मंदिर इकलौता ऐसा मंदिर है जो ग्रहण के दौरान भी खुला रहता है, क्योंकि यहां राहु और केतु की ही पूजा की जाती है।
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