ग़ाज़ियाबाद की सियासत के इतिहास में 7 मार्च 2026 की तारीख एक काले अध्याय के रूप में दर्ज की जाएगी। यह वह दिन था जब नगर निगम के सदन में जनता की उम्मीदों की अर्थी उठी और ‘जनप्रतिनिधि’ कहलाने वाले लोग मूकदर्शक बने तमाशा देखते रहे। जिस सदन को जनता की समस्याओं का समाधान करना था, वहां जनता के साथ हुए विश्वासघात पर चुप्पी की मुहर लगा दी गई। आज गाजियाबाद का हर नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। सवाल यह है कि जिन्हें हमने अपनी आवाज बनाया, वे सत्ता के गलियारों में जाकर गूंगे क्यों हो गए?

पिछले कई महीनों से गाजियाबाद की जनता हाउस टैक्स में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी से कराह रही है। डीएम सर्कल रेट के आधार पर टैक्स स्लैब तय करने के नाम पर जो खेल खेला गया, उसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। कई इलाकों में टैक्स तीन से चार गुना तक बढ़ गया है। महंगाई के इस दौर में, जहाँ दाल-रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो रहा है, वहां नगर निगम ने जनता पर टैक्स का अतिरिक्त बोझ लाद दिया।

व्यापार मंडल, आरडब्ल्यूए (RWA) और आम नागरिकों ने महीनों तक सड़कों पर संघर्ष किया। ज्ञापन सौंपे गए, प्रदर्शन हुए, और हर बार पार्षदों ने कैमरे के सामने आकर बड़े-बड़े दावे किए कि वे जनता के साथ हैं। लेकिन जब 7 मार्च की बोर्ड बैठक में इस पर ठोस निर्णय लेने का समय आया, तो इन दावों की हवा निकल गई। बोर्ड बैठक किसी भी शहर की ‘संसद’ होती है। वहां बहस होनी चाहिए थी, जनहित में प्रस्ताव पारित होने चाहिए थे, और यदि जरूरत पड़ती तो शासन के गलत आदेशों के खिलाफ सामूहिक विरोध दर्ज होना चाहिए था। लेकिन हुआ क्या?

महज औपचारिक अनुरोध! नगर आयुक्त ने शासन के आदेश का हवाला दिया और सदन ने घुटने टेक दिए। क्या पार्षद इतने असहाय हैं? क्या उनके पास सामूहिक वॉकआउट करने या इस्तीफे की धमकी देने का नैतिक साहस नहीं था? 100 से अधिक पार्षदों में से सिर्फ एक पार्षद का जमीर जागा और उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया। बाकी सब अपनी कुर्सियों से चिपके रहे। यह चुप्पी साबित करती है कि उनके लिए जनता का दर्द नहीं, बल्कि अपनी सीट और पार्टी लाइन की वफादारी सर्वोपरि है।

पार्षद और जनप्रतिनिधि अक्सर विकास का ढिंढोरा पीटते हैं। लेकिन गाजियाबाद की सड़कों पर निकलिए तो हकीकत कुछ और ही बयां करती है। टूटी सड़कें, जलभराव और गंदगी, बदहाल पार्क। जब बुनियादी सुविधाएं देने में निगम पूरी तरह विफल है, तो फिर किस हक से जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है? खराब निर्माण सामग्री और भ्रष्टाचार के खेल से अपनी जेबें भरने वाले ये नेता किस मुंह से खुद को ‘जनसेवक’ कहते हैं?

चुनाव के समय यही नेता घर-घर जाकर हाथ जोड़ते हैं। बुजुर्गों के पैर छूते हैं, युवाओं को रोजगार और बेहतर शहर का सपना दिखाते हैं। लेकिन जीतते ही इनका चरित्र बदल जाता है। जनता की आंखों में धूल झोंककर ये ‘सत्ता के चाटुकार’ बन जाते हैं। क्या आपको शर्म नहीं आती? जब आप शाम को अपने घर जाते होंगे, अपने बच्चों से नजरें मिलाते होंगे, तो क्या आपको याद नहीं आता कि आपने उस मां से क्या वादा किया था जिसका बेटा टूटी सड़क के कारण चोटिल हुआ? या उस पिता से क्या कहा था जो अपनी सीमित पेंशन में से अब भारी भरकम टैक्स भरेगा?

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जिस एक पार्षद ने इस्तीफा दिया, उन्होंने कम से कम यह तो साबित किया कि राजनीति में अभी नैतिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि “जनता के हितों को कुचलकर कुर्सी पर बैठना उन्हें मंजूर नहीं।” लेकिन बाकी पार्षदों का क्या? क्या वे पार्टी हाईकमान के डर से चुप थे? क्या उन्हें अगले चुनाव में टिकट कटने का डर था? या फिर वे नगर आयुक्त और शासन के दबाव में इतने दब चुके हैं कि उनकी रीढ़ की हड्डी ही खत्म हो गई है?

अरे, अगर केवल 10% पार्षद भी सामूहिक रूप से विरोध करते, तो प्रशासन और शासन को झुकना पड़ता। लेकिन स्वार्थ की चादर इतनी मोटी है कि जनता की चीखें वहां तक नहीं पहुंच सकीं।

गाजियाबाद की जनता को अब यह समझना होगा कि ये प्रतिनिधि अब उनके नहीं रहे। ये कुर्सी के गुलाम हैं। अब वक्त आ गया है कि जनता इनके खिलाफ ‘मोर्चा’ खोले। सूचना के अधिकार (RTI) का प्रयोग कर इनसे पाई-पाई का हिसाब मांगा जाए। किस सड़क में कितनी सामग्री लगी, किस पार्क के नाम पर कितना बजट डकारा गया—इन सबकी पोल खोलनी होगी। इन नेताओं को याद दिलाना होगा कि लोकतंत्र में मालिक जनता होती है, नेता नहीं। अगर आज ये चुप हैं, तो कल जब ये वोट मांगने आएं, तो जनता को भी अपनी चुप्पी से इन्हें करारा जवाब देना चाहिए।

हो सकता है कि मेरे इन शब्दों से कुछ सत्ताधारियों और उनके समर्थकों को मिर्ची लगे। लेकिन एक पत्रकार के नाते मेरा काम चापलूसी करना नहीं, बल्कि आईना दिखाना है। गाजियाबाद की जनता आज जो मानसिक और आर्थिक पीड़ा झेल रही है, उसके जिम्मेदार ये तमाम जनप्रतिनिधि हैं। याद रखिए- आज आपने जनता को धोखा दिया है, कल यही जनता आपको सत्ता से बेदखल कर अपना हिसाब बराबर करेगी। चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं, और जनता की याददाश्त उतनी कमजोर भी नहीं जितनी आप समझ रहे हैं।

अंत में, उस एक ईमानदार पार्षद को मेरा सलाम, और बाकी सभी के लिए सिर्फ एक मशविरा—”चुल्लू भर पानी में डूब मरने के लिए भी नैतिकता की जरूरत होती है, जो शायद आप खो चुके हैं।” अब फैसला आपको करना है कि आप किसके साथ हैं—स्वार्थी नेताओं के या अपने शहर के भविष्य के?

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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