बॉलीवुड में अच्छी बुरी फिल्में बनती रहती हैं। फ़िल्म के डायरेक्टर अपनी अपनी सोच के हिसाब से फिल्में बनाते हैं। इनमें से कुछ सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए काम करते हैं और कुछ पैसा कमाने के साथ साथ समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए समाज को एक अच्छा संदेश देने वाली फिल्में बनाते हैं।

पर हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'एनिमल' सन 2023 की सबसे बेकार और घटिया फ़िल्म है जो समाज के लिए कैंसर के समान है।

फ़िल्म के हीरो को एल्फा मेल दर्शाते हुए महिमा मंडित किया गया है। दरअसल अल्फा शब्द भेड़ियों के झुण्ड से लिया गया है। जिसमें झुण्ड का सबसे ताकतवर भेड़िया झुण्ड का सरदार होता है जिसे अल्फा कहते हैं। शिकार करके लाना और झुण्ड के बाकी भेड़ियों की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी उस अल्फा की होती है।

फ़िल्म एनिमल के हीरो को पिता के बहुत ज़्यादा व्यस्त रहने की वजह से पिता का प्यार बचपन से ही नहीं मिला है, इसलिए उसके अंदर बिहैवियर प्रॉब्लम्स हैं। वो ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक है। उसका व्यवहार मानसिक रूप से बीमार आदमी जैसा है। 

वो सिर्फ अपनेआप को सही मानता है, छोटी छोटी बातों पे उसे इतना गुस्सा आ जाता है कि किसी को भी गोली मार सकता है। फ़िल्म में ज़्यादातर कैरेक्टर औरतों को तुच्छ समझते हैं। पूरी फ़िल्म में औरत को सिर्फ उपभोग की वस्तु की तरह पेश किया गया है जिसे सोचने बोलने का कोई अधिकार नहीं होता।

फ़िल्म में हिंसा और मारकाट की बहुतायत है जो ग़ैरज़रूरी महसूस होती है। दो सौ, तीन सौ बदमाशों को हीरो अकेले एक स्पेशल गन से मार गिराता है। वो अपनी पत्नी से बहस होने पर बेडरूम में ही उसपर गन तान देता है। और कमरे में बच्चों के होते हुए फायर भी करता है।

यहाँ तक की अपने दुश्मन को अपने हाँथों से गला दबा कर और चाकू से गला रेत कर मार डालने की सजा देना उचित समझता है। 


ऐसे मेंटली सिक आदमी को हीरो बनाकर पेश करना तो डायरेक्टर की ही मनोदशा है। शायद इस फ़िल्म के डायरेक्टर संदीप रेड्डी ने अपने दिमाग़ में भरे कचरे को फ़िल्म में परोसा है। पर इस सबका ग़लत प्रभाव तो समाज पर ही पड़ता है।

इसलिए ऐसी कचरा फिल्मों से हम दूर रहें तो हमारे लिए अच्छा होगा। हम अपना ध्यान रखें और अपने दिमाग़ को डस्टबीन ना बनाएं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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