🙏🏻🌹जय श्री राधे कृष्णा 🌹🙏🏻


मित्रों अप सब को ये बताते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि आज इस शृंखला की 365वीं कड़ी प्रस्तुत है... आज इस शृंखला को एक साल पूरा हो रहा है | 

जब इसका आरम्भ किया था तब सोचा न था कि आप सभी इसको इतना पसंद करेंगे कि मैं इसकी इतनी कड़ियाँ बनाऊंगा |

सोचा था आज ही शृंखला का समापन कर दूँ लेकिन कई मित्रों की राय से मैं इसे आगे बढ़ा रहा हूँ | 

आपने इस शृंखला को इतना प्रेम दिया उसके लिए आप सभी भगवद्प्रेमी मित्रों का ह्रदय से आभार |

प्रस्तुत है श्रीमद्भगवद्गीता का आजका श्लोक... 


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।


इस श्लोक का अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

सुप्रभात 🌹🙏

पुनीत कुमार माथुर 

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