नन्ही बेटी को पाकर मैं हुआ खुशी से निहाल,
खुशी हुई इतनी कि मैं हो गया मालामाल।
उसको छूते ही न रहा मेरी खुशी का ठिकाना,
एक भाई और पिता की ममता का एहसास मैंने तब जाना।
उसको पाकर हो गया मै भावविभोर,
उसके नन्ही सी मुस्कान को देख कर, नाचे मेरे मन का मोर।
उसकी झलक से पाया, मैंने संसार सारा।
वो तो है हमारी खुशियों का पिटारा।
उसको पाने से मिल गई, मुझे खुशियां सारी।
वो तो है सबकी राजदुलारी।
उसकी एक हंसी पर, वॉर दूं अपना जीवन सारा।
उसको गोद में लेते ही भूल गया मैं गम सारा।
उसके हंसने से, महक उठा आंगन हमारा।
उसको ना देखूं तो, कहीं भी न लगे मेरा मन।
उसकी शैतानियों से, याद आए मुझे अपना बचपन।
कवियत्री
वंदना झा
नर्सिंग ऑफिसर
जीटीबी अस्पताल



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