गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में पुलिसिया उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाना पत्रकारों को भारी पड़ गया है। आज (बुधवार) सुबह से ही गाजियाबाद पुलिस ने 'भारत का बदलता शासन' समाचार पत्र के संपादक ललित चौधरी और महिला पत्रकार अपूर्वा चौधरी को उनके ही घर में हाउस अरेस्ट (नजरबंद) कर दिया है।

मिली जानकारी के अनुसार, दर्जनों पुलिसकर्मियों ने उनकी पूरी सोसाइटी को छावनी में तब्दील कर दिया है ताकि पत्रकार आज होने वाले बड़े आंदोलन में शामिल न हो सकें। इस तानाशाही पर रोष व्यक्त करते हुए पीड़ित महिला पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने पुलिस प्रशासन को ललकारते हुए कहा, "आखिर कब तक रोकोगे?"

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'जीरो टॉलरेंस' नीति को ठेंगा दिखाते हुए गाजियाबाद पुलिस पर पत्रकारों के उत्पीड़न, मारपीट और तानाशाही के गंभीर आरोप लगे हैं। पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ और न्याय न मिलने से क्षुब्ध होकर पीड़ित पत्रकार अपूर्वा चौधरी पिछले कई दिनों से अन्न त्याग (भूख हड़ताल) पर हैं।

इस मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। पुलिस प्रशासन के इस ढुलमुल रवैए और तानाशाही के खिलाफ गाजियाबाद के तमाम पत्रकारों का गुस्सा फूट पड़ा है। न्याय की मांग को लेकर आज, बुधवार (27 मई 2026) से जिला पुलिस आयुक्त (कमिश्नर) कार्यालय पर गाजियाबाद के पत्रकारों द्वारा एक बड़े अनिश्चितकालीन आंदोलन का ऐलान किया गया था, जिसे दबाने के लिए पुलिस ने सुबह से ही पीड़ितों को नजरबंद कर दिया है।

यह पूरा मामला सिद्धार्थ विहार जल निगम हल्का पुलिस चौकी से शुरू हुआ। संपादक ललित चौधरी और पत्रकार अपूर्वा चौधरी अपनी साथी महिला पत्रकार सुमन मिश्रा के साथ हुई अभद्रता की शिकायत दर्ज कराने चौकी गए थे।

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पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस के सामने ही विपक्षी दल ने उनके साथ गाली-गलौज की। कार्रवाई करने के बजाय मौके पर तैनात सब-इंस्पेक्टर आयुष कुमार और अन्य पुलिसकर्मियों ने संपादक ललित चौधरी के साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट की, उन्हें घसीटा और अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया।

पीड़ित पत्रकार अपूर्वा चौधरी द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र के अनुसार, जब वे इस मामले की शिकायत लेकर थाना प्रभारी (विजयनगर) धर्मपाल के पास पहुँचे, तो उन्होंने उल्टा पत्रकारों को ही धमकाकर थाने से बाहर खदेड़ दिया।

इसके बाद मामले की शिकायत फोन पर एसीपी उपासना पांडेय, डीसीपी सिटी और पुलिस कमिश्नर से भी की गई। अगले दिन लिखित शिकायत पत्र और ज्ञापन भी सौंपा गया, लेकिन न्याय देने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डालने और टालमटोल करने का प्रयास किया गया। पत्रकारों का कहना है कि घटना को 5 दिन बीत चुके हैं, लेकिन दोषियों को लगातार संरक्षण दिया जा रहा है और जांच किस दिशा में चल रही है, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई है।

इस घोर अपमान और मानसिक प्रताड़ना से आहत होकर पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने पहले ही प्रशासन को चेतावनी दी थी कि यदि दोषी सब-इंस्पेक्टर आयुष कुमार, थाना प्रभारी धर्मपाल और अन्य लापरवाह अधिकारियों पर तत्काल कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आत्मघाती कदम उठाने को विवश होंगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी गाजियाबाद पुलिस की होगी।

अब पत्रकारों को नजरबंद किए जाने के बाद गाजियाबाद के पत्रकार जगत में भारी आक्रोश है। एकजुट हुए पत्रकारों का साफ कहना है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का यह उत्पीड़न अब कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पुलिस चाहे जितने भी हथकंडे अपना ले, न्याय की यह लड़ाई थमने वाली नहीं है।



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