बिहार की पावन मिट्टी का,
वो अनमोल लाल था,
कुंडग्राम के राजमहल का,
वो राजकुमार था।
त्याग दिया जिसने वैभव सारा,
निकल पड़ा सत्य की खोज में।
बनकर चौबीसवां तीर्थंकर,
जो मानवता के शिखर खड़ा।
वैशाली की गलियों से उठकर,
जिसने जग को राह दिखाई,
अज्ञान के घोर अंधेरे में,
ज्ञान की नई अलख जगाई।
जीओ और जीने दो का,
उसने अमर मंत्र सुनाया।
अहिंसा परमो धर्म पाठ पढ़ाया।
सत्य के मार्ग पर चलना सिखाया।
क्रोध,मोह त्याग कर बने वो महान।
तप कर के पाया उन्होंने कैवल्य ज्ञान।
आज भी उनकी वाणी से,
मिटते मन के सब संताप,
उनका मार्ग ही काट सके,
इस कलयुग के सारे पाप।
वन्दना झा (विप्रा)
नर्सिंग ऑफिसर
गुरु तेग बहादुर हास्पिटल
दिल्ली



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