ग़ाज़ियाबाद। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के शासनकाल में महिलाओं की सुरक्षा और न्याय की जो छवि बनी है, वह इन दिनों एक गंभीर सवालों के घेरे में है। प्रदेश में "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" का नारा तो गूंजता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। गाजियाबाद के कविनगर थाना क्षेत्र में बालाजी एनक्लेव इलाके में हुई एक घटना ने न केवल एक निर्दोष परिवार को प्रताड़ित किया है, बल्कि पुलिस की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना मंगलवार रात की है, जब स्ट्रीट डॉग्स को खाना खिलाने को लेकर शुरू हुआ एक साधारण विवाद अचानक सांप्रदायिक रंग ले लेता है और सैकड़ों की भीड़ एक परिवार पर धावा बोल देती है। इस घटना में न केवल महिलाओं और बच्चियों को डराया-धमकाया गया, बल्कि कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों पर भी जानलेवा हमला हुआ। लेकिन सबसे दुखद यह है कि पुलिस ने पीड़ित परिवार पर ही कानूनी कार्रवाई कर दी, जबकि भीड़ पर कोई सख्त एक्शन नहीं लिया गया।

घटना की रात करीब 12 बजे जब मुझे एक पत्रकार साथी का फोन आया। तो उन्होंने बताया कि बालाजी एनक्लेव में स्ट्रीट डॉग्स को खाना खिलाने को लेकर कुछ लोगों में विवाद हो गया। असमाजिक तत्वों ने इस मामले को हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश की और एक समुदाय विशेष के परिवार पर सैकड़ों की भीड़ ने हमला बोल दिया। जब कुछ पत्रकार घटना की कवरेज करने पहुंचे, तो उन पर भी हमला हुआ – उनके माइक और मोबाइल तोड़ दिए गए। मौके पर पुलिस पहुंची थी, लेकिन भीड़ पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। मैं तुरंत घर से निकली और कविनगर थाने पहुंची। वहां पहले से ही पीड़ित महिला और उसकी दो बेटियां – एक बालिग और एक नाबालिग – मौजूद थीं। वे बुरी तरह डरी और सहमी हुई थीं। ठंडी रात में थाने में बैठी उन मासूम बच्चियों और उनकी मां की हालत देखकर मन व्यथित हो गया।

पत्रकार साथियों से पूरी जानकारी ली तो पता चला कि तीन तहरीरें दी गई थीं – एक पीड़ित महिला की ओर से और दो पत्रकारों की ओर से। पुलिस के जिम्मेदार अधिकारियों ने निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया। लेकिन पीड़ित परिवार को पूरी रात थाने में बिठाकर रखा गया। सुबह करीब 3 बजे मैं घर लौटी, लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह बेहद चौंकाने वाला था। पत्रकार साथी लगातार फोन करके बता रहे थे कि दूसरे पक्ष – जिनके साथ सैकड़ों की भीड़ थी – तहरीर वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। कुछ राजनीतिक दबंग और प्रभावशाली लोग आरोपियों को बचाने के लिए पुलिस और पत्रकारों पर दबाव डाल रहे हैं।

बुधवार सुबह करीब 11 बजे सभी पत्रकार साथी जिला कलेक्ट्रेट पर एकत्र हुए। वहां चर्चा हुई कि कैसे उल्टा पीड़ित पक्ष को फंसाने और पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिश हो रही है। जानकारी मिली कि पीड़ित महिला और उसकी बेटियां रात भर थाने में ही रहीं और अब पुलिस उन्हें धमकी दे रही है कि उन पर कार्रवाई होगी। मुझे भी कई फोन आए कि इस मामले को आगे न बढ़ाया जाए। सभी पत्रकारों ने एकजुट होकर कहा कि कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हमला निंदनीय है और इस पर कार्रवाई जरूरी है। शाम 4 बजे एसीपी कविनगर से मुलाकात का समय तय हुआ। जब हम थाने पहुंचे, तो देखा कि पीड़ित महिला और उसकी बेटियां अभी भी थाने में बिठाई गई हैं। उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि पुलिस कह रही है – "तुमने दंगा भड़काने की कोशिश की है, तुम पर कानूनी कार्रवाई होगी।"

संबंधित अधिकारी से बात की तो उन्होंने कहा कि वे अपनी कार्रवाई कर रहे हैं और इन महिलाओं पर शांति भंग करने के आरोप में एक्शन होगा। पत्रकारों ने सवाल पूछे तो गोल-मोल जवाब देकर टालने की कोशिश की। पत्रकारों पर हुई मारपीट और अभद्रता की शिकायत पर भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं। मैंने पुलिस का यह रवैया देखकर समझ लिया कि या तो वे दबाव में हैं या पूरी तरह लाचार हो चुके हैं। गुस्से में बाहर आ गई। पीड़ित महिला ने बताया कि उसकी बेटी का कल या परसों परीक्षा का पेपर है। ठंड में रोती हुई उन बच्चियों और मां को देखकर हाथ बंधे महसूस हो रहे थे।

यह योगी राज कैसे हो सकता है, जहां बेटियों को रात भर ठंड में थाने में बैठाया जाए और आरोपी खुले घूमते फिरें? दबंग और राजनीतिक लोग दबाव बनवा रहे हैं। शाम तक पता चला कि एक महिला पत्रकार, जिनके साथ कवरेज के दौरान बदसलूकी हुई थी, उनके परिवार को दबाव में लेकर समझौता करवा दिया गया। पीड़ित पक्ष की तहरीर का पता नहीं, जबकि आरोपी पक्ष की शिकायत पर पुलिस पीड़ितों को धमका रही है। उस परिवार पर क्या बीत रही होगी, जिसे न्याय की जगह उल्टी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है?

यह घटना न केवल एक परिवार की पीड़ा है, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। योगी आदित्यनाथ जी निष्पक्ष, निर्भीक और न्यायप्रिय व्यक्तित्व के धनी हैं। उनके शासन में महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार देखकर मन दुखी है। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" का नारा आज पूरी तरह विफल नजर आ रहा है। 150-200 की भीड़ सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश करती है और पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं करती। क्या यह योगी-मोदी का शासन है या दबंगों और असमाजिक तत्वों का?

पत्रकारों पर हमला लोकतंत्र की आवाज पर हमला है। यह निंदनीय है और इस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। मैं, अपूर्वा चौधरी, एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्ष के रूप में, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, प्रधानमंत्री मोदी जी, राष्ट्रपति और गृह मंत्री जी को पत्र लिख कर यह अपील कर रही हूं कि इस मामले का संज्ञान लें। कुछ असमाजिक तत्व योगी-मोदी सरकार को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं। गाजियाबाद पुलिस को अल्टीमेटम देती हूं कि दो दिनों के अंदर पत्रकारों से बदसलूकी करने वालों और भीड़ के मुख्य आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई करें, अन्यथा पत्रकार साथी एकजुट होकर आंदोलन करेंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की होगी।

यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कानून का राज कब तक दबाव में रहेगा? महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा कब सुनिश्चित होगी? पत्रकारों की आवाज कब दबने से रुकेगी? उम्मीद है कि उच्च अधिकारियों के हस्तक्षेप से न्याय होगा और दोषी सजा पाएंगे। अन्यथा, समाज का विश्वास पुलिस और सरकार से उठ जाएगा।

अपूर्वा चौधरी

(अध्यक्ष, एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन)



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