जय श्री राधे कृष्ण 🌹🙏


आज का ये श्लोक मैंने  श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' से लिया है ....


तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥ 

(अध्याय 3, श्लोक 19)


इस श्लोक का भावार्थ : अत: कर्म-फ़ल में आसक्त हुए बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य समझ कर कर्म करते रहना चाहिए  क्योंकि अनासक्त भाव से निरन्तर कर्तव्य-कर्म करने से मनुष्य को एक दिन परमात्मा की प्रप्ति हो जाती है। 


हमारे दैनिक जीवन में हम कई कार्य करते हैं यदि कोई भी कार्य करते हुए हम उससे मिलने वाले परिणाम के बारे में सोचें तो आवश्यक नहीं वैसे ही परिणाम प्राप्त हों ऐसे में मन दुखी होता है लेकिन यदि किसी भी कार्य को परिणाम की चिंता न करते हुए मन से किया जाए तो उसको करते हुए जो आनंद मिलेगा वो परिणाम से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।



सुप्रभात !  


पुनीत कुमार माथुर  

ग़ाज़ियाबाद

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