गाजियाबाद। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के हाईटेक जिले गाजियाबाद में पत्रकारों और पुलिस प्रशासन के बीच पिछले कई दिनों से चला आ रहा तीखा विवाद अब एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली के खिलाफ और फर्जी मुकदमों के विरोध में आज सुबह से पुलिस मुख्यालय के बाहर शुरू हुआ अनिश्चितकालीन धरना और आमरण अनशन दोपहर को प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद स्थगित हो गया।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं निर्भीक पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने गाजियाबाद के एडिशनल कमिश्नर केशव कुमार चौधरी के मौखिक आश्वासन के बाद मिठाई खाकर अपना अनशन समाप्त किया। एडिशनल कमिश्नर ने पत्रकारों को पूरी तरह आश्वस्त किया है कि इस पूरे प्रकरण की अत्यंत पारदर्शी और निष्पक्ष जांच की जाएगी। प्रशासन ने पिछले सप्ताह जिले में हुई दो-तीन बड़ी आपराधिक घटनाओं का हवाला देते हुए जांच प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पांच दिन का अतिरिक्त समय मांगा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
इससे पहले, आज सुबह जब गाजियाबाद पुलिस मुख्यालय के बाहर अनिश्चितकालीन धरने की शुरुआत हुई, तो माहौल काफी गर्माया हुआ था। आंदोलन की कमान संभाल रहीं पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने पुलिस प्रशासन और सत्ता के रसूखदारों को सीधे शब्दों में चुनौती दी। उन्होंने भावुक और आक्रोशित लहजे में कहा कि "हम कानून का सम्मान करने वाले देश के जिम्मेदार नागरिक और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ हैं। अगर हमने कोई अपराध किया है, अगर हम दोषी हैं, तो पुलिस हमें तत्काल जेल भेज दे। हमें कानून की प्रक्रिया से कोई डर नहीं है। लेकिन बिना किसी निष्पक्ष जांच के, सिर्फ अपनी कमियों को छिपाने के लिए हमारे खिलाफ फर्जी और मनगढ़ंत मुकदमे दर्ज कर हमारी सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने की कोशिश को हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। झूठे मुकदमों के दम पर हमारी आवाज को दबाने का प्रयास कभी सफल नहीं होगा।
इस धरने के शुरू होते ही स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए, जिसके बाद पूरा प्रशासनिक अमला बैकफुट पर नजर आया।
प्रदर्शनकारी पत्रकारों के अनुसार, इस पूरे विवाद की जड़ एक महिला पत्रकार के साथ हुई अभद्रता और उसकी शिकायत से जुड़ी है। आरोप है कि पीड़ित महिला पत्रकार ने गाजियाबाद पुलिस के संबंधित अधिकारियों को एक मामले में लिखित शिकायत सौंपी थी। नियमतः पुलिस को इस पर तत्काल संज्ञान लेकर त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन रसूखदारों के दबाव में आकर स्थानीय पुलिस और चौकी स्तर के अधिकारियों ने लंबे समय तक इस पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।
विवाद तब और बढ़ गया जब पीड़ित पत्रकार अपने कुछ साथियों और पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों के साथ संबंधित थाने और पुलिस चौकी पर न्याय की गुहार लगाने और वस्तुस्थिति जानने पहुंचे। पत्रकारों का आरोप है कि वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने उनके साथ न केवल बेहद अभद्र और अमर्यादित व्यवहार किया, बल्कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का भी हनन किया।
हद तो तब हो गई जब बाद में पुलिस ने उल्टा पासा पलटते हुए, शिकायतकर्ताओं और उनके पक्ष में आवाज उठाने वाले पत्रकारों को ही आरोपी बना दिया और उनके खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी। पत्रकारों का कहना है कि यह गाजियाबाद पुलिस के कुछ अधिकारियों द्वारा अपनी लापरवाही और सत्ता के प्रभाव का दुरुपयोग कर सच को दबाने का एक सीधा और घिनौना प्रयास है।
आंदोलन के दौरान पत्रकारों ने जिले के आला अधिकारियों की भूमिका पर भी तीखे सवाल दागे। अपूर्वा चौधरी ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी, लिखित शिकायतें, ज्ञापन और घटना से जुड़े पुख्ता साक्ष्य (एविडेंस) जिले के उच्च अधिकारियों तक पहुंचाए गए थे। इसके बावजूद कई दिनों तक वरिष्ठ अधिकारियों ने इस मामले पर पूरी तरह से रहस्यमयी चुप्पी साधे रखी।
अपूर्वा चौधरी ने प्रशासनिक रवैए पर प्रहार करते हुए कहा:
"हमने न्याय पाने के लिए हर उस लोकतांत्रिक और कानूनी रास्ते को अपनाया जो इस देश का संविधान हमें देता है। हमने अधिकारियों से व्यक्तिगत मुलाकातें कीं, उन्हें साक्ष्य सौंपे, शांतिपूर्ण तरीके से ज्ञापन दिए। लेकिन आज तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने सामने आकर यह नहीं बताया कि आखिर एक महिला पत्रकार की शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई और पत्रकारों के खिलाफ इतनी आनन-फानन में बिना जांच के मुकदमा क्यों दर्ज कर लिया गया? जब प्रशासन इस तरह मौन साध लेता है, तो आम जनता और न्याय चाहने वालों के मन में गहरा संदेह पैदा होता है। इसी चुप्पी ने हमें सड़क पर उतरने और आंदोलन का रास्ता चुनने के लिए मजबूर किया।"
इस आंदोलन ने एक बार फिर दिल्ली-एनसीआर सहित पूरे उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की सुरक्षा, स्वतंत्रता और उनके काम करने के माहौल पर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। धरना स्थल पर मौजूद विभिन्न पत्रकार संगठनों के नेताओं ने कहा कि यह लड़ाई अब किसी एक व्यक्ति या केवल एक एफआईआर (FIR) तक सीमित नहीं रह गई है। यह लड़ाई सीधे तौर पर पुलिस की जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और प्रेस की आजादी से जुड़ चुकी है।
पत्रकारों का मानना है कि यदि समाज के हर तबके की आवाज उठाने वाले मीडियाकर्मियों को ही उनके पेशेवर काम के कारण इस तरह से प्रताड़ित किया जाएगा, पुलिसिया तंत्र का डर दिखाया जाएगा और फर्जी मुकदमों में फंसाया जाएगा, तो यह हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक बेहद खतरनाक और अशुभ संकेत है। पत्रकारों ने साफ किया कि वे पुलिस या कानून व्यवस्था के दुश्मन नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यवस्था के भीतर पनप रहे कथित भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं।
सैकड़ों की संख्या में एकत्रित हुए पत्रकारों ने गाजियाबाद प्रशासन के सामने अपनी पांच सूत्रीय प्रमुख मांगें रखी थीं, जिन पर प्रशासन को झुकना पड़ा:
निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच: पत्रकारों के खिलाफ दर्ज किए गए मुकदमे की तत्काल प्रभाव से किसी वरिष्ठ और स्वतंत्र अधिकारी (जो स्थानीय थाने या चौकी से संबद्ध न हो) की देखरेख में निष्पक्ष जांच कराई जाए।
दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: यदि जांच में यह साबित होता है कि पुलिस अधिकारियों ने दुर्भावनावश या पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर पत्रकारों पर फर्जी मुकदमा दर्ज किया है, तो उन जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल निलंबित कर विभागीय कार्रवाई की जाए।
मूल विवाद की जांच: जिस महिला पत्रकार की शिकायत से यह पूरा विवाद शुरू हुआ था, उस मूल शिकायत पर त्वरित कार्रवाई करते हुए वास्तविक दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए।
साक्ष्यों को सार्वजनिक करना: पुलिस का दावा अगर मजबूत है तो वह अपने साक्ष्यों को पारदर्शी तरीके से सामने रखे, न कि बंद कमरों में बैठकर कहानी गढ़े।
पत्रकारों की सुरक्षा: जिले में कार्यरत सभी पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया जाए ताकि वे बिना किसी भय या दबाव के अपना काम कर सकें।
गाजियाबाद पुलिस मुख्यालय पर लगातार बढ़ते जा रहे पत्रकारों के हुजूम और मामले के तूल पकड़ने के बाद शासन-प्रशासन में खलबली मच गई। इसके बाद गाजियाबाद के एडिशनल पुलिस कमिश्नर केशव कुमार चौधरी ने पत्रकारों की सभी मांगों को ध्यानपूर्वक सुना और स्वीकार किया कि पिछले कुछ दिनों में गाजियाबाद के भीतर दो से तीन बहुत बड़ी आपराधिक घटनाएं घटित हुई थीं, जिसके कारण पूरी पुलिस फोर्स कानून-व्यवस्था बनाए रखने में व्यस्त थी और इसी वजह से इस मामले की जांच में थोड़ी देरी हुई।
एडिशनल कमिश्नर ने पत्रकारों को आश्वस्त करते हुए कहा, "पुलिस विभाग पूरी तरह से निष्पक्षता के सिद्धांत पर काम करता है। किसी भी निर्दोष पत्रकार को परेशान नहीं होने दिया जाएगा। पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय और पूरी तरह से निष्पक्ष जांच जारी है। हमें तथ्यों को पूरी तरह खंगालने के लिए 5 दिन का अतिरिक्त समय चाहिए। मैं विश्वास दिलाता हूं कि जो भी पक्ष दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कानून सम्मत और सख्त कार्रवाई अवश्य होगी।
एडिशनल कमिश्नर के इस सकारात्मक रुख और पांच दिन के भीतर दूध का दूध और पानी का पानी करने के वादे के बाद, अपूर्वा चौधरी और उनके सहयोगी पत्रकारों ने सर्वसम्मति से अपने अनिश्चितकालीन धरने और अनशन को पांच दिनों के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया।
इस ऐतिहासिक आंदोलन में गाजियाबाद ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों के पत्रकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर एकजुटता का संदेश दिया। आंदोलन की सफलता और पत्रकारों के सम्मान की इस लड़ाई में मुख्य रूप से एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन के महामंत्री पंकज शर्मा और संगठन मंत्री पवन चौधरी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।
इसके अलावा धरना स्थल पर सुमन मिश्रा, सतीश कुमार, महेश त्यागी, प्रीति मिश्रा, सद्दाम हुसैन, राहुल कुमार, पंकज तोमर, आकाश तोमर, अनिल दुबे, राजीव सिंह, विक्की बागड़ी, शमीम, विपुल कुमार, सोनी शर्मा, मनोज प्रजापति, योगेश कुमार सहित दर्जनों की संख्या में वरिष्ठ पत्रकार, छायाकार और डिजिटल मीडिया के साथी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि यदि पांच दिनों के भीतर प्रशासन ने अपना वादा पूरा नहीं किया और निष्पक्ष जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई, तो यह आंदोलन दोबारा और अधिक उग्र रूप में शुरू होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
फिलहाल, गाजियाबाद में तनावपूर्ण शांति है और सबकी निगाहें अब पुलिस प्रशासन द्वारा मांगी गई 5 दिनों की इस मियाद और आने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं।




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