गाजियाबाद। गाजियाबाद में पत्रकारों और पुलिस प्रशासन के बीच चल रहे विवाद ने अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले लिया है। पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने रविवार को घोषणा करते हुए कहा कि 1 जून से गाजियाबाद पुलिस मुख्यालय के बाहर भ्रष्टाचार, पत्रकार उत्पीड़न और कथित फर्जी मुकदमों के विरोध में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि पत्रकार वास्तव में दोषी हैं तो उन्हें कानून के अनुसार जेल भेज दिया जाए, लेकिन झूठे मुकदमे दर्ज कर उनकी सामाजिक और पत्रकारिता की छवि को धूमिल करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा। 

अपूर्वा चौधरी ने कहा कि पिछले कई दिनों से पत्रकार न्याय की उम्मीद में गाजियाबाद पुलिस प्रशासन और उच्च अधिकारियों के दरवाजे खटखटा रहे हैं, लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर निष्पक्ष कार्रवाई दिखाई नहीं दी है। उनका आरोप है कि पुलिस अधिकारियों की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। आखिर ऐसे कौन से कारण हैं कि बार-बार शिकायत करने, साक्ष्य उपलब्ध कराने और उच्चाधिकारियों को अवगत कराने के बावजूद कथित दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन जब यही स्तंभ दबाव, भय और मुकदमों के जरिए झुकाने का प्रयास किया जाए तो यह केवल पत्रकारों का नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का प्रश्न बन जाता है। उनका कहना है कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि उन सभी लोगों की लड़ाई है जो सच बोलने और लिखने का साहस रखते हैं।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब महिला पत्रकार सुमन मिश्रा ने एक व्यक्ति पर अभद्रता करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई। आरोप है कि शिकायत के बावजूद कई दिनों तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। बाद में जब पत्रकार मामले की जानकारी लेने संबंधित पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे तो घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। पुलिस चौकी में हुई बातचीत के दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया और इसके बाद पुलिसकर्मियों द्वारा पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। आरोप यह भी है कि दैनिक समाचार पत्र "भारत का बदलता शासन" के संपादक ललित चौधरी के साथ अभद्र व्यवहार किया गया तथा उन्हें जबरन पुलिस वाहन में बैठाकर थाने ले जाया गया।

दूसरी ओर, पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमे में पत्रकारों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसी मुकदमे को पत्रकार पक्ष पूरी तरह फर्जी और मनगढ़ंत बता रहा है। पत्रकारों का कहना है कि जिन लोगों ने न्याय की मांग की, उन्हीं को आरोपी बनाकर खड़ा कर दिया गया।

अपूर्वा चौधरी ने कहा कि पिछले दस दिनों से अधिक समय से वे और उनके साथी लगातार न्याय की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मामले की शिकायत पुलिस कमिश्नर, डीसीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई गई, लेकिन अभी तक किसी भी स्तर पर ऐसी कार्रवाई दिखाई नहीं दी जिससे निष्पक्ष जांच की उम्मीद मजबूत हो। 

उन्होंने कहा-"हम बार-बार पूछ रहे हैं कि आखिर उच्चाधिकारी मौन क्यों हैं? यदि पुलिसकर्मियों ने कोई गलती नहीं की है तो निष्पक्ष जांच करवा दीजिए। यदि पत्रकार दोषी हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई कीजिए। लेकिन यदि पुलिसकर्मियों ने अपने पद का दुरुपयोग किया है तो फिर उनके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।" अपूर्वा ने सवाल उठाया कि जब प्रशासन लगातार निष्पक्षता और पारदर्शिता की बात करता है तो फिर इस मामले में कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। उन्होंने कहा कि यह चुप्पी आम लोगों के मन में भी कई तरह की शंकाएं पैदा कर रही है। अपूर्वा चौधरी ने अपने बयान में कहा कि पत्रकारों को डराने, धमकाने और बदनाम करने की कोशिशें नई नहीं हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि ऐसे प्रयासों का खुलकर विरोध किया जाए।

उन्होंने कहा कि पत्रकारों ने हमेशा कानून का सम्मान किया है और आगे भी करेंगे, लेकिन कानून के नाम पर किसी भी प्रकार का उत्पीड़न स्वीकार नहीं किया जाएगा। हमने हर संभव प्रयास किया कि मामला शांतिपूर्ण तरीके से सुलझ जाए। हमने अधिकारियों को समय दिया। हमने साक्ष्य उपलब्ध कराए। हमने लिखित शिकायतें दीं। लेकिन जब लगातार उपेक्षा हुई तो अब आंदोलन ही एकमात्र विकल्प बचा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण होगा और इसका उद्देश्य केवल न्याय की मांग करना है।

पत्रकार संगठनों और समर्थकों ने घोषणा की है कि 1 जून से गाजियाबाद पुलिस मुख्यालय के बाहर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक निष्पक्ष जांच और न्याय सुनिश्चित नहीं होता, तब तक धरना जारी रहेगा। धरना स्थल पर विभिन्न पत्रकार संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और लोकतांत्रिक अधिकारों की पैरवी करने वाले लोग भी पहुंच सकते हैं। आयोजकों का दावा है कि आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है और बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। 

अपूर्वा चौधरी ने कहा कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है। उनका कहना है कि जब पत्रकारों को ही अपनी सुरक्षा और न्याय के लिए आंदोलन करना पड़े तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा यह केवल अपूर्वा चौधरी, ललित चौधरी या किसी एक पत्रकार का मुद्दा नहीं है। यह उस व्यवस्था का प्रश्न है जिसमें सच बोलने वाले लोगों को दबाने का प्रयास किया जाता है। यदि आज पत्रकारों की आवाज दबाई जाएगी तो कल आम नागरिक की आवाज भी दबाई जा सकती है। अपूर्वा चौधरी ने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य टकराव पैदा करना नहीं है। उन्होंने प्रशासन से पुनः अपील की कि निष्पक्ष जांच कराई जाए और तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए।

उन्होंने कहा हम किसी से विशेष व्यवहार नहीं मांग रहे। हम केवल निष्पक्ष जांच चाहते हैं। यदि जांच में हम दोषी निकलते हैं तो कार्रवाई कीजिए। लेकिन यदि आरोप झूठे हैं तो फिर दोषी लोगों को भी जवाबदेह ठहराइए।

अपूर्वा चौधरी ने प्रदेश भर के पत्रकारों, सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और न्यायप्रिय नागरिकों से आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई जाए। उन्होंने सभी साथियों से अधिक से अधिक संख्या में आंदोलन स्थल पर पहुंचकर समर्थन देने का आग्रह किया। आंदोलन की घोषणा के साथ उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि यह संघर्ष किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि न्याय, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है।



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