प्रियंका झा, सीतामढ़ी: 27 फ़रवरी। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी का विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है। विशेष रूप से काशी विश्वनाथ मंदिर में यह पर्व अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है तथा इसे काशी में होली उत्सव के औपचारिक आरंभ के रूप में भी माना जाता है।

पौराणिक कथा : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। विवाह के उपरांत जब माता पार्वती पहली बार अपने ससुराल काशी आईं, तब देवताओं, ऋषियों और काशीवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया।

कथा के अनुसार, काशी नगरी में इस आगमन को उत्सव के रूप में मनाया गया और भगवान शिव-पार्वती को अबीर-गुलाल अर्पित कर आनंदोत्सव किया गया। इसी परंपरा की स्मृति में प्रतिवर्ष रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ को गुलाल अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन स्वयं भगवान शिव भक्तों के साथ रंगों में रँग जाते हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व : रंगभरी एकादशी का व्रत रखने और विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करने से दांपत्य जीवन में प्रेम, सौहार्द और स्थिरता बनी रहती है। विवाहित महिलाएं माता पार्वती से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु विशेष पूजा करती हैं।

इस अवसर पर मंदिरों में विशेष श्रृंगार, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन एवं शोभायात्राओं का आयोजन किया जाता है। वातावरण पूर्णतः भक्तिमय एवं उत्सवी हो उठता है। रंगों के माध्यम से भक्त अपने आराध्य के प्रति प्रेम, उल्लास और समर्पण की भावना व्यक्त करते हैं।

रंगभरी एकादशी न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, प्रेम और आनंद का संदेश भी देती है।

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