नई दिल्ली : पुनीत माथुर। मित्रों आज से हम एक नया साहित्यिक कॉलम शुरू कर रहे हैं। इस कॉलम में हर सप्ताह एक लोकप्रिय साहित्यकार की पांच उत्कृष्ट रचनाएं हम आपके लिए लेकर आएंगे।

आज इस क्रम में हम लाए हैं मेरठ (उप्र) की लोकप्रिय कवयित्री व शायरा ऋतु अग्रवाल जी की 5 उत्कृष्ट रचनाएं।

ऋतु जी चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में परास्नातक हैं। उन्होंने संगीत विशारद भातखंडे लखनऊ यूनिवर्सिटी से किया है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी ऋतु जी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से डिप्लोमा इन कुलिनरी आर्ट्स एवं डिप्लोमा इन फाइन आर्ट्स भी किया हुआ है।

ऋतु जी के लेखन क्षेत्र की बात करें तो वो कविता, भजन, गीत,गज़ल, बंदिश, लेख, कहानी, नाटक, संस्मरण, दोहे, हाइकु, बालकथा, बालगीत, कथा वाचन की विधाओं में लिखती रही हैं।

उनकी साहित्यिक व सांस्कृतिक उपलब्धियां उनके कार्यक्षेत्र की विविधताएं दर्शाती हैं। ऋतु जी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन होता रहता है। वो लंदन रेडियो में एंकरिंग कर चुकी हैं। साधना टीवी एवं AVS चैनल पर प्रस्तुति दे चुकी हैं। लगभग उन्नीस साझा संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।

इनके अतिरिक्त फेसबुक एवं यूट्यूब पर लाइव एकल काव्य पाठ, लघुकथा वाचन, आनलाइन व ऑफलाइन अनेक कवि सम्मेलन, गोष्ठी व मुशायरों में शिरकत करती रही हैं।

ऋतु अग्रवाल जी ’हमारा प्यारा भारत साहित्यिक संस्थान’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष, ’केसरिया हिंदू वाहिनी सांस्कृतिक प्रकोष्ठ’ की उत्तर प्रदेश इकाई में प्रदेश महामंत्री, ’आगमन समूह’ की मेरठ जिला प्रभारी, ’प्रगति सेवा समिति’ की उपाध्यक्ष और ’केसरिया हिंदू वाहिनी’ की मीडिया प्रभारी हैं।

ऋतु जी के साक्षात्कार बेटियाँ समूह, मिर्जा गालिब समूह, परवाज़ समूह जैसे प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों द्वारा किए गए हैं व विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। 


आइए ऋतु जी की गजलों और कविताओं का आनंद लेते हैं...

अभी प्यार उसने जताया कहाँ है,

बदन में लहू सा बहाया कहाँ है।


तख़्ती ये दिल की है कोरी अभी तक, 

मुहब्बत का कलमा पढ़ाया कहाँ है।


मुझे न पता जायका हाला क्या है,

निगाहों से तूने पिलाया कहाँ है।


भटकता हूँ मैं दरबदर बावरा सा,

तख़्त ए जिगर पे बिठाया कहाँ है।


नसीम ए सहर में तेरी खुशबू बाकी, 

गई रात हमको सुलाया कहाँ है।


लबों की नमी को बरस जाने भी दे,

अभी इश्क बाराँ (बारिश) कहाँ है।


नहीं शोख़ चंचल दीवानी अभी जा,

नज़र से नज़र को मिलाया कहाँ है।


रहूँ ढूँढता हर शक्ल में तुझे ही,

कहाँ जान तू तेरा साया कहाँ है।


’मरहटा छंद’ पर आधारित रचना, जिसका शीर्षक है ’प्रिय पावस आया’....

प्रिय पावस आया, नभ सुधा लाया, ताप मिटा तन, अकुलाया।

दादुर कोलाहल, कूके कोयल, चातक टेरे, घन छाया।।


पक्षी हैं चहके, धरती महके, जग सारा ही, सौंधाया।

टिप-टिप कर बूँदे, माटी गूँधे, धूल कणों को, औटाया।।


सावन के झूले, मम हिय फूले, कजली तीजा, आन गई। 

कटि रूपक करधन, चूड़ी कंगन, बोले खन-खन, जान गई।।


नथ, पायल बिछिया, मस्तक टिकिया, सूरत सुंदर है भोली। 

प्रिय पावस आया, मन हर्षाया, सजनी प्यारी है डोली।।


ग़ज़ल...

प्यार का रिश्ता हमारा खोखला हो जाएगा,

दूर गर यूँ ही रहा तो बेवफ़ा हो जाएगा।


वो जगा एहसास मुझसे दूर फिर क्यूँ हो गया,

याद का ये सिलसिला मेरी कज़ा हो जाएगा।


हम रहे तनहा, तुझे भी कौन सा सुख मिल गया,

क्या पता था इश्क़ अपनी वेदना हो जाएगा।


दिल में कुछ अंगार से उठते हैं तुमको देखकर,

सामने जो आप आए हादसा हो जाएगा।


आपसे तन्हाई में घुट कर करेगा बात जो,

देख लेना महफ़िलों में ग़ैर सा हो जाएगा।


बाप की दौलत लुटा माँ को दिखाता आँख जो,

वो गिरा इंसा किसी का क्या सगा हो जाएगा।


दोस्तों से दुश्मनी ’ऋतु’ सोचकर करना ज़रा,

बाँचकर वो राज़ तेरे डाकिया हो जाएगा।


एक गीत ’सावन के झूले’...

ए री सखी तीज आई रे 

काली घटाएँ छाई रे 

रिमझिम बरसे सावनवा 

शीतल बयार हर्षाई रे

ए री सखी तीज आई रे।


अमवा की डलिया पर 

झूले डाल दो सखी री 

हरे भरे बगियन में 

गुंजन गान हो सखी री 

बाग की कली मुस्काई रे 

ए री सखी तीज आई रे।


झूम-झूम तीज गायेंगे 

झूले की पींगे बढ़ायेंगे 

मस्त मगन होकर हम तुम 

नाचेंगे खूब गायेंगे 

खुशी अपार पाई रे 

ए री सखी तीज आई रे।


हरी हरी चूड़ी पहनकर 

हरे परिधान में लिपट कर 

मेहंदी रचा कर हाथों में 

लाज से खुद में सिमटकर 

पिया से मैं शर्माई रे 

ए री सखी तीज आई रे।



ग़ज़ल ’ये निगाहें मेरी’...

नहीं सुनती हमारी कुछ बड़ा तकरार करती हैं,

भला रोकूँ इन्हें कितना तुम्हीं से प्यार करती हैं।


निगाहें आपसे करती बयाँ दिल की कहानी है,

हमें तुमसे मुहब्बत है यही इकरार करती हैं।


बड़ा नाज़ुक हमारा दिल जरा सी ठेस से टूटे,

सँभालो प्यार से इसको सनम मनुहार करती हैं।


हमारा हाल मत पूछो कि हम बेहाल रहते हैं,

बहा ये अश्क अपने दर्द का इज़हार करती हैं।


मुहब्बत की तड़प हर रोज एक नई चोट देती है,

लगा जो घाव पहले से उसी पर वार करती हैं।


अगर हँसकर करे बातें किसी भी गैर से दिलबर,

बहुत रोती बिलखती हैं खुद ही को खार करती हैं।


तुम्हारे प्यार में हम तो कभी के हैं लुटे बैठे,

ज़रा सा पास आ जाओ यही मनुहार करती हैं।


न जाने कौन सी अज़मत मुहब्बत में बसी रहती,

निगाहें यार के रस्ते सदा गुलज़ार करती हैं।


महकती धड़कनें खुश्बू बिखेरे मेरी साँसों में,

नज़र तेरी सनम मेरा बदन गुलदार करती हैं।


बँधे हैं तार तनमन के हमारे दरमियाँ ऐसे,

नहीं तुम पास हो फिर भी नज़र इंतज़ार करती हैं।

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