अधिकतर मंत्रों के प्रारंभ में 'ॐ' का प्रयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि इसे समस्त सृष्टि का मूल, ब्रह्म का प्रतीक और सबसे पवित्र ध्वनि माना जाता है। यह ध्वनि मंत्रों को शुद्ध करती है, उनकी शक्ति बढ़ाती है, मन को एकाग्र करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर वातावरण को आध्यात्मिक बनाती है।
'ॐ' को ईश्वर (ब्रह्म) का वाचक माना जाता है। यह सृष्टि का स्रोत है।
मंत्र जाप के दौरान अगर कोई त्रुटि या अशुद्धि हो, तो ॐ उसे ठीक कर देता है।
ॐ तीन अक्षरों - 'अ' (उत्पन्न होना), 'उ' (विकास), और 'म' (मौन/ब्रह्मलीन) से मिलकर बना है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को दर्शाता है।
ॐ के उच्चारण से शारीरिक और मानसिक शांति मिलती है। वैज्ञानिक रूप से इसके कंपन से शरीर में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है और तनाव कम होता है।
यह सदियों से चली आ रही एक पवित्र परंपरा है जो मंत्रों को प्रभावी बनाती है।
संक्षेप में, ॐ का उच्चारण आत्म-अध्ययन, मानसिक शांति और ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
आलेख : पुनीत माथुर


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