भक्ति और राष्ट्रवाद का अनूठा संगम
संग्रह का प्रारंभ 'माँ शारद-गीत' से होता है, जहाँ "अम्बर धरती के पास हुआ" जैसी पंक्तियाँ एक सुखद उजास का अनुभव कराती हैं। वहीं, कवि की सामाजिक चेतना तब मुखर होती है जब वे स्वदेशी अपनाने और विदेशी वस्तुओं के मोह त्यागने की अपील करते हैं। एक सैनिक के दृष्टिकोण से, कवि का शासन-व्यवस्था की चुस्ती और "स्वदेशी चीज़ों" के प्रति आग्रह अत्यंत सराहनीय है।
सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार
जायसवाल जी की लेखनी केवल रूमानी नहीं है, बल्कि वह आम आदमी और विशेषकर गरीबों के प्रति गहरी सहानुभूति रखती है। उनकी एक गज़ल की पंक्तियाँ व्यवस्था पर गहरा चोट करती हैं:
"बदल गयीं हैं हुकूमत यहाँ कई लेकिन, > ग़रीब और उलझते गये बहानों में"
यह शेर शासन और सत्ता के बीच पिसते आम आदमी की व्यथा को बखूबी बयां करता है।
नैतिकता और किरदार की महत्ता
संग्रह में 'किरदार की अज़मत' (चरित्र की महानता) पर विशेष जोर दिया गया है। लेखक का मानना है कि जो लोग विपरीत परिस्थितियों में भी अपना स्वाभिमान और किरदार संभाले रखते हैं, वही वास्तव में सम्मान के पात्र हैं। इसके अलावा, "इंसानियत के प्रति कोशिशें" और "सिंदूरी रज मलने" जैसे बिंब कविता को आध्यात्मिक और मानवीय धरातल पर ऊँचा उठाते हैं।
निष्कर्ष
'पयामे ज़ीस्त' एक ऐसी कृति है जो प्रेम, अध्यात्म, सामाजिक न्याय और राष्ट्रभक्ति के विविध रंगों को एक ही धागे में पिरोती है। विनय सागर जायसवाल जी की सरल भाषा और गूढ़ विचार हर वर्ग के पाठक को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
"सँभाले रखते हैं किरदार की जो अज़मत को, > उन्हीं को फ़ख़्र भी हासिल है कद्रदानों में"
मैं इस अनमोल भेंट के लिए लेखक का सहृदय आभार व्यक्त करता हूँ और विश्वास करता हूँ कि यह संग्रह साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाएगा।
समीक्षक : आचार्य नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु" जी, साहित्यकार एवं सैन्य प्रशासनिक कनिष्ठ-अधिकारी


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