पटना: 22 जनवरी बृहस्पतिवार। प्रख्यात लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतक डॉ. बीरबल झा ने देशभर के नागरिकों, छात्रों, शिक्षकों तथा शिक्षण संस्थानों से बसंत पंचमी से एक दिन पूर्व ‘सरस्वती चतुर्थी’ को आत्मचिंतन, अनुशासन और ज्ञान-वंदना के दिवस के रूप में मनाने का राष्ट्रीय आह्वान किया है।

डॉ. झा ने कहा कि यह पहल भारत की उस सभ्यतागत परंपरा से प्रेरित है, जिसमें उत्सव से पहले तैयारी और आरंभ से पहले संकल्प को विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित आयोजन की जड़ें प्राचीन गुरुकुल परंपरा और भारतीय दर्शन की अवधारणा ‘संकल्प’ में निहित हैं।

डॉ. बीरबल झा ने कहा, “भारत में उत्सव से पहले तैयारी की परंपरा रही है। हम पूजा से पहले तैयारी करते हैं, आनंद से पहले चिंतन करते हैं और उत्सव से पहले आत्मशुद्धि। सरस्वती चतुर्थी हमारी शैक्षिक और सांस्कृतिक चेतना में उस चिंतनशील अनुशासन को पुनर्जीवित करने का प्रयास है।”

उल्लेखनीय है कि बसंत पंचमी को देशभर में देवी सरस्वती—ज्ञान, विद्या, भाषा, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी—के पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है। डॉ. झा के अनुसार, बसंत पंचमी से एक दिन पूर्व सरस्वती चतुर्थी का आयोजन इस पर्व के लिए आध्यात्मिक और बौद्धिक भूमिका तैयार करेगा।

उन्होंने कहा, “बसंत पंचमी ज्ञान का उत्सव है, जबकि सरस्वती चतुर्थी उसकी तैयारी का अवसर हो सकती है। ज्ञान तभी फलता-फूलता है, जब उसे विनम्रता और सजगता के साथ अपनाया जाए।”

इस राष्ट्रीय आह्वान के तहत सरस्वती चतुर्थी को छात्रों और शिक्षकों द्वारा अपने शैक्षिक जीवन पर आत्ममंथन, आजीवन अध्ययन के प्रति प्रतिबद्धता के नवीनीकरण, तथा अनुशासन, जिज्ञासा, विनम्रता और कृतज्ञता जैसे मूल्यों के विकास के अवसर के रूप में मनाने का सुझाव दिया गया है। इसके साथ ही पुस्तकों और अध्ययन सामग्री को खरीदने, संजोने, व्यवस्थित करने और सम्मान देने पर भी बल दिया गया है।

डॉ. झा ने स्पष्ट किया कि यह पहल किसी भी विद्यमान धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा को बदलने अथवा चुनौती देने के उद्देश्य से नहीं है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य बसंत पंचमी के उत्सव को भारतीय दर्शन में निहित तैयारी की भावना से और अधिक समृद्ध बनाना है।

उन्होंने कहा, “यह परंपराओं में बदलाव का नहीं, बल्कि उन्हें और अर्थपूर्ण बनाने का प्रयास है। जब तैयारी का भाव जुड़ता है, तब उत्सव भी गहराई प्राप्त करता है।”

शिक्षण संस्थानों को “आधुनिक भारत के ज्ञान-मंदिर” बताते हुए डॉ. झा ने विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से इस आयोजन को अपनाने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा, “शिक्षा को केवल रोजगार तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह व्यक्तित्व, संस्कृति और चेतना के निर्माण की प्रक्रिया है। सरस्वती चतुर्थी छात्रों को यह स्मरण दिला सकती है कि शिक्षा एक आजीवन साधना है।”

डॉ. झा ने विश्वास व्यक्त किया कि यह पहल भारत की ज्ञान-परंपरा को सुदृढ़ करेगी और आने वाली पीढ़ियों को गरिमा, अनुशासन और श्रद्धा के साथ अध्ययन के लिए प्रेरित करेगी।

यह राष्ट्रीय आह्वान डॉ. बीरबल झा, प्रबंध निदेशक, ब्रिटिश लिंगुआ तथा अध्यक्ष, मिथिलालोक फाउंडेशन द्वारा जारी किया गया है। दोनों संस्थाएँ शिक्षा, भाषा और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में सक्रिय योगदान के लिए जानी जाती हैं।

आह्वान के अंत में नागरिकों से आग्रह किया गया है कि वे उत्सव से पहले तैयारी करें, आनंद से पहले चिंतन करें और घोषणा से पहले अध्ययन करें।

“जय माँ शारदे,” के साथ यह राष्ट्रीय अपील संपन्न होती है।



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